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रूम 16 — एक अलग तरह का ठहराव

 

1877 में, क्राइटेरियन होटल ओआमारू के व्यस्त केंद्र में खड़ा था—
एक ऐसा शहर जो व्यापार, यात्राओं और लंबी रातों से बना था।

 

बंदरगाह से लोग जेब में पैसे और खर्च करने के लिए कहानियाँ लेकर आते थे।
नीचे का बार आधी रात के बाद तक गूंजता रहता था, और ऊपर के कमरे शायद ही कभी खाली होते थे।

 

लेकिन हर मेहमान आराम के लिए नहीं आता था।

 

उन दिनों, क्राइटेरियन जैसे स्थान सिर्फ होटल नहीं थे।
वे जगहें थीं जहाँ सौदे होते थे… जहाँ अजनबी मिलते थे…
और जहाँ गोपनीयता मायने रखती थी।

 

स्थानीय लोग इसके बारे में खुलकर बात नहीं करते थे।
उन्हें इसकी ज़रूरत भी नहीं थी।

 

हर कोई समझता था कि कुछ दरवाज़े सिर्फ रात बिताने के लिए नहीं खुलते थे।

 

रूम 16 उन दरवाज़ों में से एक बन गया।

 

वहाँ कौन ठहरता था?
यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप किससे पूछते हैं।

 

कुछ कहते हैं यह बस एक व्यस्त होटल का एक साधारण कमरा था।
दूसरे कहते हैं यह वह जगह थी जहाँ लोग वही पाते थे जो वे ढूंढ रहे थे—
और बिना ज़्यादा सवाल किए चले जाते थे।

 

कोई भी रिकॉर्ड पूरी कहानी नहीं बताता।
और शायद यही इसका मकसद था।

 

क्योंकि ऐसे स्थानों में…
बंद दरवाज़ों के पीछे जो होता था, वह कभी रात से ज़्यादा नहीं टिकता था।

एक अकेला नाविक किनारे आया, नमक अब भी उसकी त्वचा पर था
जेब में थोड़ी ईमानदार कमाई, और एक प्यास जो उसे भीतर खींच लाई
थेम्स स्ट्रीट पर लालटेनें जल रही थीं, रात नरम और धीमी थी
और बार में फुसफुसाहटें तैर रही थीं, उन जगहों की जहाँ वह जा सकता था

 

वह क्राइटेरियन में दाखिल हुआ, बोला, “बस एक पेय मेरे लिए”
पर व्हिस्की के साथ हिम्मत धीरे-धीरे बढ़ती है, जैसे मन खुलने लगता है
उसने कमरे को देखा, वहाँ की हँसी, वो तेज़ और चालाक नज़रें
और किसी धुंधले कोने में… उसे एक जानती हुई नज़र मिली

 

होंठों से कानों तक एक नंबर गुज़रा
एक धीमी सी बात, जिसे सुनने को वह झुका

 

ओह… रूम 16, उस दरवाज़े के पीछे
जहाँ दिल तेज़ धड़कते हैं और चाहतें बढ़ती हैं
एक मुस्कान, एक स्पर्श, एक पल का सपना
एक रात शुरू होती है रूम 16 में

 

उसके जूते लकड़ी पर धीमे थे, उसकी साँस एक स्थिर ढोल
उसने मुड़कर देखा कि कोई देख तो नहीं रहा… फिर उसने धीरे से कहा, “आओ”
एक हल्की दस्तक, एक कदम पीछे, उसकी धड़कन छुप न सकी
दरवाज़ा खुला, उसकी आँखें उससे मिलीं… और उसे भीतर खींच ले गईं

 

मोमबत्ती की रोशनी सोने सी झिलमिलाई, दुनिया पीछे छूट गई
न नाम पूछे गए, न सच्चाई कही गई, बस दो शरीर साथ बहते गए
घंटे रेशमी शराब की तरह फिसल गए, न माप, न कोई हिसाब
ऐसी रात जिसे कोई खो दे… फिर भी अपना ही कहे

 

ओह… रूम 16, उस दरवाज़े के पीछे
जहाँ दिल तेज़ धड़कते हैं और चाहतें बढ़ती हैं
एक मुस्कान, एक स्पर्श, एक पल का सपना
एक रात जो जाते वक्त साथ चलती है

 

वह सुबह की पहली रेखा में धीरे चला, एक मुस्कान छुपाए न छुपी
जेब हल्की, पर मन भरा हुआ, एक नरम सा गर्व लिए
दरवाज़ा बंद होते हुए उसने फिर मुस्कुराया, “ज़्यादा दूर मत रहना…”
उसने टोपी झुकाई, सुबह में कदम रखा… और साथ एक गीत ले गया

 

बंदरगाह पुकार रहा था, जहाज़ चल पड़ा, समंदर गहरा और विशाल
पर लहरों के बीच कहीं…
वह अब भी रूम 16 का सपना देखता रहा

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